1857 की क्रान्ति से पहले का वक्त —अँगरेज़ फौज का एक भारतीय दस्ता गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर देता है , इस से अँगरेज़ घबरा जाते हैं i उस दस्ते में सबसे सीनियर सूबेदार एक यदुवंशी भोन्दू सिंह जी थे और उनसे जूनियर एक ब्राह्मण सूबेदार था i अँगरेज़ अफसर कहता है कि आप सब जवानों की सामने कारतूस चलाये ताकि बगावत ना हो i वीर अहीर सूबेदार भोन्दू सिंह जी बोले की अपना धर्म नहीं त्याग सकता ,चर्बी वाले कारतूस नहीं चलाऊंगा , लेकिन ब्राह्मण सूबेदार ने वो कारतूस चला दिया तो अँगरेज़ ने उस ब्राह्मण को ऊँचा पद दे दिया जब की वो हकदार नहीं था i इस घटना के कुछ दिन बाद ही अपना धर्म बचाने के लिए सूबेदार भोन्दू सिंह जी और उस की पलटन ने अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया और कान्हापुर (आज का कानपूर) में नाना साहब पेशवा की फौजों से मिल गये i कानपूर में मोर्चा जम गया -गंगा के सती चौरा घाट के एक तरफ सूबेदार भोन्दू सिंह जी के सैनिक थे और दूसरी तरफ अँगरेज़ i अँगरेज़ जनरल ने सफ़ेद झंडा फ़हरा कर कहा की वो मोर्चे से हट रहें हैं और वे नावों की तरफ बढ़े तो नाना साहेब ने सूबेदार साहब को कहा की मारों इनको i सूबेदार साहब के जवानों और नाना साहब के आदमियों ने सती चौरा घाट पर गंगा जी के नीर को अंग्रेजों के खून से रंग दिया i वहां इतने अँगरेज़ मारे गये थे कि 1857 की क्रांति के दौरान अँगरेज़ अफसर अपने सैनिकों को बदले की भावना से ललकार कर कहते थे “remember kanpur —कानपुर को याद करो “i इस के बाद सूबेदार भोन्दू सिंह जी आजमगढ़ के मोर्चे पर अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गये अपने साथियों के साथ —-ये कहानी है 1857 की क्रान्ति के एक गुमनाम यदुवंशी योद्धा ——सूबेदार भोन्दू सिंह जी की i कुछ साल पहले जब हम अहीरों के 1857 की क्रान्ति के योगदान के इतिहास को ढूँढने लगे तो इस वीर अहीर को हम ने ढूंढ निकाला गुमनामी के पन्नों से और फिर एक पुस्तक /स्मारिका “यादव शौर्य गाथा ” में इस यदुवीर के बारे में लिखा , अभी भी ये शोध जारी है i
Photo: 1857 की क्रान्ति से पहले का वक्त ---अँगरेज़ फौज का एक भारतीय दस्ता गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर देता है , इस से अँगरेज़ घबरा जाते हैं i उस दस्ते में सबसे सीनियर सूबेदार एक यदुवंशी भोन्दू सिंह जी थे और उनसे जूनियर एक ब्राह्मण सूबेदार था i अँगरेज़ अफसर कहता है कि आप सब जवानों की सामने कारतूस चलाये ताकि बगावत ना हो i वीर अहीर सूबेदार भोन्दू सिंह जी बोले की अपना धर्म नहीं त्याग सकता ,चर्बी वाले कारतूस नहीं चलाऊंगा , लेकिन ब्राह्मण सूबेदार ने वो कारतूस चला दिया तो अँगरेज़ ने उस ब्राह्मण को ऊँचा पद दे दिया जब की वो हकदार नहीं था i इस घटना के कुछ दिन बाद ही अपना धर्म बचाने के लिए सूबेदार भोन्दू सिंह जी और उस की पलटन ने अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया और कान्हापुर (आज का कानपूर) में नाना साहब पेशवा की फौजों से मिल गये i कानपूर में मोर्चा जम गया -गंगा के सती चौरा घाट के एक तरफ सूबेदार भोन्दू सिंह जी के सैनिक थे और दूसरी तरफ अँगरेज़ i अँगरेज़ जनरल ने सफ़ेद झंडा फ़हरा कर कहा की वो मोर्चे से हट रहें हैं और वे नावों की तरफ बढ़े तो नाना साहेब ने सूबेदार साहब को कहा की मारों इनको i सूबेदार साहब के जवानों और नाना साहब के आदमियों ने सती चौरा घाट पर गंगा जी के नीर को अंग्रेजों के खून से रंग दिया i वहां इतने अँगरेज़ मारे गये थे कि 1857 की क्रांति के दौरान अँगरेज़ अफसर अपने सैनिकों को बदले की भावना से ललकार कर कहते थे "remember kanpur ---कानपुर को याद करो "i इस के बाद सूबेदार भोन्दू सिंह जी आजमगढ़ के मोर्चे पर अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गये अपने साथियों के साथ ----ये कहानी है 1857 की क्रान्ति के एक गुमनाम यदुवंशी योद्धा ------सूबेदार भोन्दू सिंह जी की i कुछ साल पहले जब हम अहीरों के 1857 की क्रान्ति के योगदान के इतिहास को ढूँढने लगे तो इस वीर अहीर को हम ने ढूंढ निकाला गुमनामी के पन्नों से और फिर एक पुस्तक /स्मारिका "यादव शौर्य गाथा " में इस यदुवीर के बारे में लिखा , अभी भी ये शोध जारी है i

हिंदुस्तान जिन्दाबाद —- 1947 में उड़ी-पुंछ के मोर्चे पर ये अन्तिम यलगार थी वीर राव सरदार सिंह जी की i वीर भूमि अहीरवाल के लाम्बा गोत्र के प्रसिद्ध ठीकाने “अचीना” के वीर यदुवंशी राव सरदार सिंह जी ने उस दिन अपने मुट्ठी भर अहीरों के साथ मिल कर 200 पाकिस्तानियों का अंतिम साँस तक मुकाबला किया था और नाम “अहीर” को रोशन किया था i ————- उस दिन यदुवीरों की एक टुकड़ी गाड़ियों में सवार हो कर मोर्चे पर जा रही थी कि अचानक दुश्मन ने घात लगा कर हमला बोल दिया , राव सरदार सिंह जी तुरंत गाडी से नीचे कूद गये लेकिन एक गोली उन के पैर में लग गयी i घायल अहीर शेर ने मोर्चा संभाल लिया , उनके साथी उन्हें इलाज़ के लिए हटाने लगे तो उन ने इंकार कर दिया और दुश्मन से लोहा लेते रहे i अचानक जब 200 पाकिस्तानियों का झुण्ड सामने आ गया तो ये वीर यदुवंशी अकेला ही स्टेन-गन से फायर करता हुआ उन से जूझ गया i और उनकी अंतिम यलगार “हिंदुस्तान जिंदाबाद” कश्मीर की वादियों में गूँज गयी —— रणबंका यदुवीर अपना क्षात्र-धर्म निभाते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ और इंद्रा-सभा में वीरों के आसन पर विराजमान हुए i उनकी इस असाधारण वीरता और बलिदान के लिए मरणोपरांत उन्हें “वीर चक्र” से नवाज़ा गया i ———————–ऐसी मर्द कौम क्या “अहीर रेजिमेंट” की हकदार नहीं है ? ———अब वक्त आ गया है , ये फैसला हो जाना चाहिए —– क्या तो सब की तोड़ दो या फिर हमारी भी जोड़ दो i————– अहीर रेजिमेंट जिंदाबाद i


एक किसान चौधरी सुधर सिंह जी को एक साधू बोला — “तुम्हारा ये लड़का कुल का नाम रौशन करेगा” —और ये लड़का — लाइटवेट की कुश्ती का चैंपियन — भारतीय राजनीति का हैवीवेट “नन्हा नेपोलियन” बन गया i इस बच्चे के दादा ने कांग्रेस के संस्थापक A.O.Hume का नमक आन्दोलन में विरोध किया था और एक युग के बाद “पहलवान पोता” खुद कांग्रेस के खिलाफ खड़ा था i अपने से कई गुना भारी पहलवानों को राम-बाण,कैंची और धोबी-पाट से चित्त करने वाला, महाबली गामा और चन्दगीराम जैसे पहलवानों से दो-दो हाथ करने वाला — अपनों के हाथों ही चित्त हो गया और जब “नन्हे नेपोलियन” ने “दिल्ली-फ़तेह” करने की कोशिश करी —तो फिर से चरितार्थ हो गया —“अहीर को अहीर मारे , या मारे भगवान” i तीन बार प्रधानमंत्री न बनने की वजह —अपनों की ही अडचन रही i चौधरी चरण सिंह जिस पहलवान को “नन्हा नेपोलियन” कहते थे —“इटावा की मिटटी का लाल” -कट्टर यादव-वादी — असल जाति प्रेमी थे —–जब VP सिंह ने पुलिस के ज़रिये जब डकैत उन्मूलन के नाम पर “यादवों” को मारना शुरू किया, तो ये पहलवान “कठोर सिंह” बन कर VP सिंह के विरोध में डट कर खड़े हो गये थे i VP सिंह इस के बाद सदा “कठोर सिंह” के विरोध में ही रहे और इस में उनका साथ दिया जबलपुर के यादवी-लट्ठ और बिहार के यादवी-लट्ठ ने i इनाम में “साइकिल” जीतने वाले पहलवान की राजनितिक साइकिल यादवी – लट्ठ के जोर पर चल निकली i पक्के यादव-वादी “नन्हे-नेपोलियन” ने राजनीति में “यादवी” पहचान कायम करी —कोई गिला-शिकवा नहीं है बस एक मीठी सी दर्द भरी टीस है और एक ही अर्ज़ है —

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“नन्हे नेपोलियन” अगर इस बार मौका मिले तो “अहीर रेजिमेंट” के निर्माण से न चूकना —- आप का नाम अमर हो जाएगा “सैफई के शेर” iजय “अहीर रेजिमेंट” i जय हो i

प्रस्तुति : राव अजित सिंह


दिल्ली हम आ रहे है (अहीर रेजिमेंट गूंज )

दिल्ली तेरी गलियों में फिर शोर होगा
अहीर रेजिमेंट का गूंज चहुंओर होगा
एक ख्वाब जो अधुरा रह गया है ,
उसे पूरा करने आ रहे है
दिल्ली हम आ रहे है–दिल्ली हम आ रहे है

इससे पहले इस मुद्दे पर हम नही मिले है
जागती आँखों से सपना देखा है हमने
उस सपनों को हकीकत में बदलने आ रहे है
दिल्ली हम आ रहे है–दिल्ली हम आ रहे है

तेरी सड़को, तेरी गलियों ने पुकारा है हमे
यूँ तो भीड़ होती है हर मांग मुद्दे पर बहुत
उस भीड़ में एक और इजाफा करने आ रहे है
दिल्ली हम आ रहे है–दिल्ली हम आ रहे है

रेजिमेंट अरमान तुमसे मिले बिना पूरा नही होगा
बहुत सर्द रहती है इस समय हवायें तेरी
उन सर्द हवाओं को सहने जा रहे है
दिल्ली हम आ रहे है===दिल्ली हम आ रहे है=


यादवों’ के सन्दर्भ में दिए जाने वाले कुतर्क और उनके तार्किक उत्तर

कुतर्क 1 : भगवान श्रीकृष्ण का जन्म ‘क्षत्रिय’ वंश में हुआ था और उनका पालन-पोषण एक ग्वाल परिवार में।

जवाब : श्रीकृष्ण के पिता का नाम राजा ‘वासुदेव’ और माता का नाम ‘देवकी’ था। जन्म के पश्चात् उनका पालन-पोषण ‘नन्द बाबा’ और ‘यशोदा’ माता के द्वारा हुआ।
महाभारत के अनुसार राजा वासुदेव के पिता का नाम ‘राजा सूरसेन’ था। ‘राजा सूरसेन’ के एक भाई का नाम था ‘पार्जन्य’.
‘पार्जन्य’ के नौ पुत्र थे- उपानंद, अभिनंद, नन्द, सुनंद, कर्मानंद, धर्मानंद, धरानंद, ध्रुवनंद और वल्लभ। ‘नन्द बाबा’ ‘पार्जन्य’ के तीसरे पुत्र थे।
इस प्रकार राजा वासुदेव और नन्द बाबा चचेरे भाई थे। दोनों ही ‘यदुवंशी’ क्षत्रिय थे। नन्द बाबा की बाद की पीढियां ही नंदवंशी कहलाई। क्यूँ की ये लोग गौ पालन करते थे इसलिए ग्वाल/अहीर भी कहलाये। जन्म के पश्चात श्रीकृष्ण को कंस से बचाने के लिए ही वासुदेव यमुना नदी को पार कर ‘गोकुल’ पहुंचे, जहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण को अपने भाई ‘नन्द बाबा’ के हवाले किया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डिटेल इधर से भी ले http://yadavavansh.blogspot.in/2013/02/blog-post_9.html
‘भागवत पुराण’ के अनुसार ‘नन्द बाबा’ के पास नौ लाख गायें थी। उनकी बड़ी ख्याति थी। और वे पूरे गोकुल और नंदगाँव के संरक्षक थे।
कुछ लोग अज्ञानतावश कुतर्क देते है। परन्तु सच यही है की ‘श्रीकृष्ण’ का जन्म और पालन-पोषण ‘यदुवंशी-क्षत्रिय’ परिवार में ही हुआ था जो आजकल ‘यादव’ नामसे जाने जाते है। यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि ग्वाल/अहीर भी यदुवंशी क्षत्रिय वंश से ही ताल्लुक रखते है। कालांतर में वे गौ पालन और संरक्षण में लग गये।

कुतर्क 2 : अहीर यदुवंशी क्षत्रिय नहीं होते।

जवाब: ऊपर यह बात बताया जा चुका है कि ग्वाल और अहीर भी ‘यदुवंशी क्षत्रिय’ वंश से ही ताल्लुक रखते है।
‘अहीर’ एक ‘प्राकृत’ शब्द है जो संस्कृत के ‘अभीर’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘निडर’.
अपनी निडरता और क्षत्रिय वंश के कारण की इनका नाम ‘अहीर’ पड़ा। बाद में अहीरों ने अपने साम्राज्य भी स्थापित किये। जिसका उल्लेख भिन्न-भिन्न पुराणों में भी मिलता है।
अंग्रेजी हुकूमत ने अपने राज में जब जाति के आधार पे जनगणना करायी तो ‘अहीरों’ को Martial Caste के वर्ग में रखा। अग्रेजों ने अहीरों के नाम पे सेना में चार कंपनिया भी बनायीं।
आजकल भारतीय सेना की सबसे सुसज्जित रेजिमेंट ‘कुमाओं रेजिमेंट’ मुख्य रूप से ‘अहीरों को ही भर्ती करती है।

कुतर्क 3: भगवान श्रीकृष्ण ‘यादव’ नहीं राजपूत थे।

जवाब:यह कुतर्क कभी-कभी वे लोग जिनकी बुद्धिलब्धि(Intelligence Quotient) शुन्य है वो देते है।
श्रीमदभागवत गीता में एक श्लोक है :
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥११- ४१॥
(गीता-अध्याय 11, श्लोक 41)
इस श्लोक में अर्जुन भगवान ‘श्रीकृष्ण’ को ‘यादव’ नाम से संबोधित करते है।
राजा ‘ययाति’ के पांचो पुत्रों (यदु, तुर्वसु, द्रुहू, अनु और पुरु) को ऋग वेद में ‘पाञ्चजन्य’ कहा गया है।
गौरतलब है कि ‘यदु’ ने ही ‘यदुवंश’ की शुरुवात की थी इसलिए ऋग वेद के अनुसार यदुवंशी(यादव) ‘वैदिक क्षत्रिय’ है।
‘यादव’ शब्द का उल्लेख ऋग वेद , गीता तथा भागवत पुराण में भी है।
इसके विपरीत आपको कहीं भी किसी भी धार्मिक पुस्तक में ‘सिंह’ अथवा ‘राजपूत’ शब्द नहीं मिलेगा। पहली बार ‘राजपूत’ शब्द का उल्लेख छठवी शताब्दी (6th Century A.D.) में मिलता है।
लेखकों और शोधकर्ताओं के अनुसार राजपूत विदेशी आक्रमणकारी ‘हुन जाति’ से संबंध रखते है। यहाँ तक कि ‘राजपूतों’ का ‘वैदिक सनातन धर्म’ से भी कोई ताल्लुक नहीं है। छठवी शताब्दी में ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को भारत से ख़तम करने के लिए राजपूतों को सुनियोजित तरीके से ‘हिन्दू’ धर्म में सम्मलित किया और ‘क्षत्रिय’ का दर्ज़ा दिया।
अतः ऊपर दिए तर्कों से ये स्पष्ट है की भगवान श्रीकृष्ण का राजपूत शब्द से कोई सम्बन्ध नहीं है।

कुतर्क 4: कुछ प्रान्तों में ‘यादव’ पिछड़े वर्ग में शामिल है इसलिए वे ‘क्षत्रिय’ नहीं है।

जवाब: कुछ प्रान्तों में ‘यादव’ पिछड़े वर्ग में शामिल है। आरक्षण उन वर्गों को दिया गया है जो शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े थे। इसलिए ये वर्ग सरकारी नौकरियों में भी पीछे थे। इनकी भागदारी सुनिश्चित करने के लिए ही इन्हें आरक्षण दिया गया। क्षत्रिय धर्म का पालन करने की वजह से यादवों मेंशारीरिक शिक्षा को महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि यादवों में ‘पहलवानी’ की परंपरा रही है। इसलिए आज़ादी के समय तक यादव जाति शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ गयी। और इन्हें पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया।
आरक्षण मिलने और नहीं मिलने के आधार पर किसी का वर्ण नहीं बदला जा सकता।
उदाहरण के लिए ‘कायस्थ’ जाति को ही ले लीजिये। वर्ण-व्यवस्था में कायस्थों को ‘शूद्रों’ की श्रेणी में रखा गया है, परन्तु इन्हें कोई आरक्षण नहीं मिलता।ये सामान्य वर्ग में है।सामान्य वर्ग में होने के बावजूद भी इन्हें ‘ब्राह्मण’ या ‘क्षत्रिय’ वर्ण में शामिल नहीं किया जा सकता।
ऐसे ही उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की दो उपजातियाँ है-नायक और गिरी। इन दोनों जातियों को पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है, और आरक्षण का लाभ दिया जाता है। फिर भी ये जातियाँ ब्राह्मण ही मानी जाएँगी।
ठीक ऐसे ही ‘यादव’ भी ‘वैदिक क्षत्रिय’ ही माने जायेंगे। इनका वर्ण नहीं बदला जा सकता।

कुतर्क 5: ‘यादव’ क्षत्रिय है तो दूसरी क्षत्रिय जातियों में विवाह क्यूँ नहीं करते ?

जवाब: ‘वैदिक काल’ से लेकर छठवी शताब्दी तक ‘यादव’ दूसरी क्षत्रिय जातियों में विवाह करते थे। छठवी शताब्दी में विदेशी राजपूतों के आगमन के साथ समाज में कौन असली है और कौन नकली ये पहचान करना मुश्किल हो गया। ‘यादव’ साधारण तौरपर थोड़े रूढ़िवादी होते है। संशय की स्थिति में दूसरी जाति में विवाह के स्थान पर उन्होंने अपनी जाति में ही विवाह करना उचित समझा।

Posted by: YADAV WARRIORS | January 24, 2014

यदुकुल के गौरव


यदुकुल के दसवें मुख्यमंत्री -अखिलेश यादव

यादव इतिहास बड़ा गौरवशाली है. इस कुल में समय-समय पर, जीवन के हर क्षेत्र में, ऐसी अनेक विभूतियों ने जन्म लिया जिन्होंने अपने सामर्थ्य, योग्यता एवं कुशलता के बल से न केवल विश्व के इतिहास पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी, बल्कि यदुकुल का भी नाम रोशन किया. राजनैतिक क्षेत्र में भी ऐसे ही अनेक यदुवंशियों ने समाज व देश की सेवा करते हुए उच्च पदों पर आसीन हुए. विभिन्न गौरवशाली पदों पर काम कर चुके ऐसे अनेकों महानुभाव हैं उन सबका नाम लिखना यहाँ असंगतहोगा.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न प्रदेशों में अब तक तीन यदुवंशियों को राज्यपाल , दस को मुख्यमंत्री और एक को लोकसभा स्पीकर के रूप में पदासीन होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. उनका विवरण नीचे दिया गया है:-
मुख्यमंत्री-दिल्ली में :
1 . चौधरी ब्रह्मप्रकाश, दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री (1952 से 1955 तक)
मुख्यमंत्री-उत्तर प्रदेश में :
1 .राम नरेश यादव ———–(23 .6 .1977 से 27 .2 . 1979 तक )
2 . मुलायम सिंह यादव —–(2 .12 .1989 से 24 .6 .1991 तक )
मुलायम सिंह यादव—-(4 .12 .1993 से 2 .6 .1995 तक )
मुलायम सिंह यादव—–(29 .8 .2003 से 12 .5 .2007 तक )
3 अखिलेश यादव………..(15.3.2012
मुख्यमंत्री-बिहार में :
1 . वी.पी. मंडल —————-1968
2 . दरोगाप्रसाद राय ———-(16 .2 .1970 से 22 .12 .1970 तक )
3 . लालू प्रसाद यादव——–(11 .3 .1990 से 24 .7 .1997 तक )
4. राबडी देवी —————–(24 .7 . 1997 से 3 .3 .2000 तक )
राबडी देवी—————-(11 .3 .2000 से 7 .3 .2005 तक )
मुख्यमंत्री-मध्य प्रदेश में :
1 . बाबूलाल गौर ——–2007

मुख्यमंत्री-हरियाणा में :
1 . राव वीरेन्द्र सिंह 1967

राज्यपाल -राजस्थान में
1.बलिराम भगत

राज्यपाल-गुजरात में
1.महीपाल शास्त्री

राज्यपाल-मध्य प्रदेश में
1. राम नरेश यादव
लोकसभा स्पीकर:
1. बलिराम भगत
वर्तमान समय में मुलायम सिंह यादव और उनके सुपुत्र अखिलेश यादव ऐसे दो महान व्यक्ति हैं जिनका जिक्र आते ही यदुवंशियों का सीना गर्व से फूल जता है. मुलायम सिंह यादव एक जाने माने सफल समाजवादी नेता है. उन्हें लोग प्यार से “नेताजी'” कहते हैं. वे तीन बार उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा एक बार केंद्र में रक्षामंत्री रह चुके हैं. अपने पिताश्री के पद-चिन्हों पर चलते हुए अखिलेश यादव ने हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश की विधान-सभा चुनाव में, युवा वर्ग के सहयोग से , अभूतपूर्व कारनामा कर दिखाया. विधान -सभा की 403 में 224 सीटें जीत कर उन्होंने सबको आश्चर्यचकित कर दिया. 15 मार्च, 2012 वे यदुकुल के दसवें मुख्यमंत्री बने. वे उत्तर प्रदेश के सबसे कम आयु वाले मुख्यमंत्री है.

 
Ramchandra Yadav commented on this.

यादव महासभा द्वारा गाजियाबाद मे आज एक भव्य लौकिक सम्मेलन का आयोजन किया गया | देश भर से करीब 250 -300 यादव वीर सम्मेलन को सुभोभित किए | ऐसा पहली बार मैंने देखा की सम्मेलन स्थल पर यादवों का वह वर्ग मौजूद था जो अपने समाज मे बहू प्रतिष्ठित पदो पर विराजमान है ,एक साथ इतने बड़े बड़े कर्म शील विरो को देखकर मन प्रफुलित हुआ | सभी घोषित वक्ता ने अपने बात बखूबी तरीके से रखा ,श्रोता मत्रमुग्ध थे (विशेष रूप से मैं साध्वी जी का जिक्र करना चाहता हु )| शिक्षा -बेरोजगारी प्रतिनिधित्व समेत बहुत से मुद्दो पर बात हुई | याद दिलाने पर मीडिया जागृति तथा अहीर रेजीमेंट मुद्दो पर भी संज्ञान लिया गया | वक्तावो की बहुलता ने हम जैसे को निराश भी किया | कुछ अपनी बाते जिसे मैं लिखना जरूरी समझता हु ! सवाल ये की इतना भव्य (मैं इस शब्द पर ज़ोर दे रहा हु ) आयोजन हम किसके लिए किए थे ? आखिर अपने परिवार का कौन सा ऐसा वर्ग है जिसके जागृति -रोजगार हित की बात हम करते है ? इतने बड़े बुद्धिजीवी वर्ग अपनी बाते रखता है ,घर जाता है ! लेकिन क्या उनके इस बात को समाज का वह वर्ग सुनता है ,जिसके लिए यह प्रोग्राम सही मायने मे कराये जाते है ? मैं कुछ बाते लिख नहीं सकता ,लेकिन दिल मे दर्द होता है ,दिल का एक कोना बार बार सवाल करता है ,हम किसके लिए कर रहे है इतनी भव्यता ? मेरे लिए आप के लिए (तमाम वो कथित बुद्धिजीवी वर्ग ) जिसके लिए कसर मैंने “महान” शब्द का सम्बोधन सुना ,मुझे इस शब्द से दिक्कत है ? महान शब्द का प्रयोग सिर्फ “खेतो के उन बेटो के लिए किया जाये जो पेड़ की छाव देखकर पसीने का मापन करते है “| मुझे लगता है की हमे इस बारे मे आत्म मंथन करने की जरूरत है की हम सम्मेलन कोई बड़ा करे या छोटा करे ,लेकिन खेतो के उन बेटो के बारे मे जिक्र जरूर करे ,उनकी उपस्थिती जरूर कराये | दिल के संस्मरण और भी है ! बस इतना की एक बार दिल से इस भव्य आयोजन के लिए अवनीन्द्र भैया सिकंदर भैया को दिल से चरण स्पर्श | जय यादव जय माधव

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आज तक पर जब रेजांगला के वीर अहीर की डाक्यूमेंट्री देख रह था तो पुरे एपिसोड में सिर्फ एक बार अहीर शब्द आया | इस तकलीफ और दर्द को हमें बारीक रूप में समझना होगा |कवीर बेदी एंकर थे ,जब वे बोले की प्रकृति दिक्कतों के बाद भी जिस तरह से एक बहादुर पलटन अहीर ने बहादुरी दिखाई ,उससे चीन के सैनिक भी हतप्रभ रह गए |

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विश्व इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ की किसी विरोधी सैनिक देश ने दुसरे देश के सैनिको  को इतना सम्मान दिया (चीनियों ने दिया था जब हमारे वीर अहीर शेरों की लाशों को चीनियों ने कम्बल से ढका और उनके सिर के साथ उनकी बन्दूक को खड़ा किया और एक कार्ड पर “बहादुर” लिख कर उनके सीने पर रख दिया और फिर रेडियो पीकिंग से खबर दी की चीन का सबसे ज्यादा नुक्सान रेजांगला में हुआ क्योंकि एक बहुत ही बहादुर कौम ने रेजांगला में मुकाबला किया था )|
आप को कैसे यकीन दिलाये की यह एक सिहरन पैदा करने वाली स्थिति थी ,दुःख की बात है ,जिस कथा को पुरे विवरण को पूरी दिलेरी से दिखाना चहिये था ,उसे मात्र दो शब्दों में निपटा दिया गया |

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कुछ मिले श्रोतो को आप के सामने रख रहा हु ,आप इसे कॉपी पेस्ट के माध्यम से हर जगह फैलाये ..

दुनिया का सैन्य इतिहास यूं तो वीरता की कहानियों से भरा पड़ा है, परंतु रेजांगला की गौरवगाथा हर लिहाज से शहादत की अनूठी दास्तां हैं। बिना किसी तैयारी के अहीरवाल के वीर जवानों ने आज ही के दिन 18 नवंबर 1962 को लद्दाख की दुर्गम बर्फीली चोटी पर शहादत का ऐसा इतिहास लिखा था, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह यहां के वीरों के जज्बे का ही परिणाम था, जिसके चलते चीन सीज फायर के लिए मजबूर हो गया था। बेशक भारत को इस युद्ध में अधिकारिक रूप से जीत नसीब नहीं हुई, परंतु सामरिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी जाने वाली रेजांगला पोस्ट पर यहां के जांबाज जवानों ने हजारों चीनी सैनिकों को मार गिराया था। रेजांगला पोस्ट पर वर्ष 1962 की इस लड़ाई में तत्कालीन 13 कुमाऊं बटालियन के कुल 124 जवान शामिल थे, जिनमें से 114 शहीद हो गये थे। शहादत देने वालों में अधिकांश जवान अहीरवाल क्षेत्र के थे। कुर्बानी देने से पूर्व इन जवानों ने देश की सरहद की ओर बढ़ रहे चीन के 1300 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। इस युद्ध की खास बात यह थी कि चीनी सैनिक जहां पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों व बर्फीले मौसम से पूरी तरह अभ्यस्त थे, वहीं मैदानी क्षेत्रों से गये भारतीय सैनिकों के लिए परिस्थितियां पूरी तरह प्रतिकूल थी। हथियारों के मामले में भी भारतीय जवान चीन के सैनिकों से पीछे थे। विशेष बात यह भी थी कि चीन जहां पूरी तैयारी के साथ युद्ध मैदान में उतरा था, वहीं भारत-चीनी भाई-भाई के नारे के बीच भारत को सपने में भी चीनी आक्रमण का आभास नहीं था। रेजांगला पोस्ट पर लड़ रहे वीरों के सामने परीक्षा की घड़ी 17 नवंबर की रात उस समय आई, जब तेज आंधी-तूफान के कारण रेजांगला की बर्फीली चोटी पर मेजर शैतान सिंह भाटी के नेतृत्व में मोर्चा संभाल रहे सी कंपनी से जुड़े इन 124 जवानों का संपर्क बटालियन मुख्यालय से टूट गया। ऐसी ही विषम परिस्थिति में 18 नवंबर को तड़के चार बजे युद्ध शुरू हो गया। नजदीक की दूसरी पहाडि़यों पर मोर्चो संभाल रहे अन्य सैनिकों को रेजांगला पोस्ट पर चल रहे इस ऐतिहासिक युद्ध की जानकारी तक नहीं थी। लद्दाख की बर्फीली, दुर्गम व 18 हजार फुट ऊंची इस पोस्ट पर सूर्योदय से पूर्व हुए इस युद्ध में यहां के वीरों की वीरता देखकर चीनी सेना कांप उठी। इस युद्ध में 124 में से कंपनी के 114 जवान शहीद हो गये, लेकिन उन्होंने चीन के आगे बढ़ने के मंसूबों पर पानी फेर दिया। पीकिंग रेडियो ने भी तब केवल रेजांगला पोस्ट पर ही चीनी सेना की शिकस्त स्वीकार की थी। रेजांगला पोस्ट पर दिखाई वीरता का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने कंपनी कंमाडर मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार पदक परमवीर चक्र से अलंकृत किया था तथा इसी बटालियन के आठ अन्य जवानों को वीर चक्र, चार को सेना मैडल व एक को मैंशन इन डिस्पेच का सम्मान दिया था। इसके अलावा 13 कुमायूं के सीओ को एवीएसएम से अलंकृत किया गया था। भारतीय सेना के इतिहास में किसी एक बटालियन को एक साथ बहादुरी के इतने पदक अब तक कभी नहीं मिले। सरकार ने चार्ली कंपनी की वीरता को देखते हुए बाद में एक अहम निर्णय लेते हुए कंपनी का दोबारा गठन किया तथा इसका नाम रेजांगला रखा। रेजांगला युद्घ में शहीद हुए सैनिकों में मेजर शैतान सिंह पीवीसी जोधपुर के भाटी राजपूत थे, जबकि नर्सिग सहायक धर्मपाल सिंह दहिया (वीर चक्र) सोनीपत के जाट परिवार से थे। कंपनी का सफाई कर्मचारी पंजाब का रहने वाला था। इनके अलावा शेष सभी जवान अहीर जाति के थे। इनमें से भी अधिकांश हरियाणा के रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़ व सीमा से सटे अलवर जिले के रहने वाले थे।

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ख़ास बात ये रही की जब गोलियां खत्म हो गई तो जवानों ने हथियारों का इस्तेमाल लाठियों के रूप में किया और रेजांगला पोस्ट पर दुश्मन का कब्जा होने नहीं दिया। हमारी आने आने वाली पीढि़यों को प्रेरणा मिले …
जय यादव जय माधव


• बंधुओ मै आज फौज में अहीर (यादव ) रेजिमेंट की क्या जरुरत है और इस के क्या फायदे हैं , उस के बारे में सब ग़लतफहमी दूर करने का प्रयास इस लेख के ज़रिये कलम से कर रहा हूँ – 
• फौज ( थल सेना ) में सिपाहियों (अफसरों और क्लर्क की नहीं )ज्यादातर भर्ती (रिक्रूटमेंट ) जाति /क्षेत्र /मज़हब के आधार पर ही होती हैi सन 1857 के संग्राम के बाद अंग्रेजो ने सोचा की अगर भारत को गुलाम बनाये रखना है तो एक ऐसी फौज खड़ी करनी पड़ेगी जिसकी निष्ठा सिर्फ उसकी जाति /क्षेत्र /धर्म पर हो न की भारत के प्रति i और इस दिशा में उन्होंने जाति/क्षेत्र और धर्म आधारित रेजिमेंट बना दी i आज फौज में तीन मुख्य लड़ने वाले अंग है – इन्फेंट्री , तोपखाना और टैंक (कैवेलरी ) – और इन तीनो अंगो और इंजिनियर विंग में तक़रीबन सारी भर्ती जाति /क्षेत्र /धर्म के आधार पर होती है i उदाहरण के लिए जैसे गढ़वाल रेजिमेंट है – गढ़वाल रेजिमेंट में सिर्फ गढ़वाली ही भर्ती किये जातें हैं (गढ़वाल उत्तराखण्ड राज्य का एक क्षेत्र है ) और डोगरा रेजिमेंट में सिर्फ डोगरा भर्ती किये जाते हैं , सिख रेजिमेंट में सिर्फ सिख (वो भी सिर्फ जट सिख ) भर्ती किये जाते हैं i इसी प्रकार जाट , राजपूत , महार , सिख लाइट इन्फेंट्री , मराठा , डोगरा नाम की रेजिमेंट जाति आधारित और राजपुताना राइफल्स, गढ़वाल राइफल्स , kumaon , मद्रास आदि क्षेत्र आधारित रेजिमेंट हैं i ये एक तरह से जाति/क्षेत्र /धर्म आधारित आरक्षण है i सबसे बड़ा तमाशा ये है कि भारतीय सविंधान या किसी न्यायालय से इस आरक्षण को कोई मान्यता प्राप्त नहीं है i ये खेल अंग्रेजो ने अपने वफादारों के लिए शुरू किया था और आज़ाद भारत में आज तक चल रहा है i ये खत्म इस लिए नहीं हो रहा क्योंकि इस अवैध आरक्षण की मलाई सिर्फ कुछ मुटठी भर लेकिन बहुत ही मज़बूत जातियां खा रही हैं और सम्पूर्ण समाज इस हकीकत से अनजान है i 

• अहीर रेजिमेंट के फायदे – 
• 1. एक रेजिमेंट में करीब 25000 हज़ार जवान होते हैं , अगर हमारी रेजिमेंट होगी तो इस में सिर्फ अहीरों के बच्चो को ही रोज़गार मिलेगा i
• 2. कोई भी जवान इस से रिटायर होता है या शहीद हो जाता है तो उस की जगह सिर्फ अहीर ही भर्ती होगा i obc में 4500 जातियां आती हैं , अगर एक यादव रिटायर होता है या मर जाता है तो उस की जगह एक obc ही आएगा लेकिन जरुरी नहीं की वोह यादव आएगा , लेकिन फौज में जाट के बदले जाट और गढ़वाली के बदले में गढ़वाली ही आता है, इन जाति /क्षेत्र आधारित रेजिमेंट में i क्या ऐसा आरक्षण कभी देखा है ? 
• 3.जब भी कोई बहादुरी दिखाई जायेगी तो जिस की रेजिमेंट होगी उस ही का नाम होगा 
• 4.जब कंधे पर “अहीर ” लिखा होगा तो पहचान मिलेगी और जवान कहीं भी जाएगा तो उस को अपना नाम बताने की जरुरत नहीं है 
• 5 . आने वाले दौर में सब डिपार्टमेंट सिवाए – फौज , पुलिस और टैक्स विभाग के , सब का निजीकरण हो जाएगा और नौकरियां प्राइवेट सेक्टर में चली जायेंगी तो आरक्षण का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा i सिर्फ उपरोक्त तीन महकमों में ही आरक्षण रहेगा i और सब से ज्यादा रोज़गार फौज में ही है (आज तक़रीबन 13 लाख) i
• 6. फौज को जवान रखना पड़ता है इस लिए सब से ज्यादा भर्ती हर साल फौज में ही होती है क्योंकि इस में रिटायरमेंट की उम्र 58 या 60 साल नहीं होती i जब आप के नाम की कोई रेजिमेंट होगी तो सिर्फ आप के ही बच्चो को रोज़गार मिलेगा i
इन्फेंट्री में जातिगत ढांचा – 
1 . जाट रेजिमेंट – सारे जाट (सिर्फ एक बटालियन अजगर यानी अहीर , जाट, गुजर और राजपूत ) एक रेजिमेंट में करीब 20 -25 बटालियन होती हैं और हर बटालियन में करीब 1000 आदमी होते हैं 
2 . राजपूत – 50 % राजपूत , 30 % के करीब गूजर और बाकी 20 % में ब्राहमण , बंगाली , मुस्लिम आदि 
3 . गढ़वाल – 100 % गढ़वाली 
4. डोगरा – 100 % डोगरा 
5 . kumaon – 75 % कुमाउनी और 22 % अहीर और बाकी ब्राहमण और राजपूत 
6 . सिख – सारे जट सिख
7 . सिख लाइट इन्फेंट्री – दलित सिख ( मज़हबी और रामदासिया )
8 . गोरखा – सारे गोरखा 
9 . मद्रास – सारे दक्षिण भारत के लोग 
10 . मराठा – सारे मराठा
11 . पंजाब – सिख और डोगरा (मुट्ठी भर कुछ और ) 
12 . बिहार – 50% आदिवासी , 50 % बिहारी 
13 . नागा – 75 % नागा , 25 % कुमओनी 
14 . लद्दाख – सारे लद्दाखी
15 . जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंट्री – सारे कश्मीरी 
16 . जम्मू कश्मीर राइफल्स – सारे कश्मीरी 
17 . राजपुताना राइफल्स – 50% राजपूत , 45% जाट और मुट्ठी भर गूजर , मुस्लिम , अहीर 
18 . ग्रेनेडियर्स – ज्यादातर राजपूत , जाट और डोगरा , मुट्ठी भर अहीर , गूजर , मुस्लिम 
19 . गार्ड्स – सब जातियां 
20 . आसाम राइफल्स – सारे पहाड़ी और कुछ बाकी जातियां 
21 . राष्ट्रीय राइफल्स – सारी जाति आधारित 
22 . महार – दलित महार और मुट्ठी भर दूसरी जातियां 
23. तोपखाना – ज्यादातर जाति आधारित – सिख , जाट , राजपूत , ब्राहमण , मुस्लिम ,अहीर , गढ़वाली , गोरखा ,डोगरा आदि 
24. आर्म्ड (टैंक) – ज्यादातर सिख , डोगरा ,राजपूत और जाट , मुट्ठी भर बाकी जातियां 
25. इंजिनियर – ज्यादातर सिख , मराठा और मुट्ठी भर बाकी जाति , 
26.President Bodyguard (राष्ट्रपति के अंगरक्षक ) – जाट,राजपूत और सिक्ख 

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पौराणिक काल से ही अहीरों का शस्त्रों व सेना से अटूट नाता रहा है i “अहीर” शब्द संस्कृत के “आभीर ” शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है जिसका अर्थ है – निर्भीक i यादव वीरों और उनकी अजेयी नारायणी सेना ने महाभारत के युद्ध में अपना बेजोड़ शौर्य प्रदर्शित किया था i प्राचीन समय में तो कई राज्यों में सेनापति का पद सिर्फ अहीरों के लिए ही आरक्षित था i नर्मदा के तट पर सर्वप्रथम समुद्रगुप्त की विजयवाहिनी को रोकने वाले वीर अहीर ही तो थे i फिर दासता का युग आया – तुर्कों का शासनi लेकिन अहीर फिर भी अपनी तलवारों का शौर्य दिखलाते रहे i करनाल के युद्ध में वो शेर का बच्चा शमशेर बहादुर राव बालकिशन , अपने 5000 अहीर रणबांकुरों के साथ उस लूटेरे नादिरशाह से जूझ गया i नादिरशाह ने अहीरवाल की तलवारों की दिल खोल कर प्रशंसा की दिल्ली के बादशाह के समक्ष i इस के बाद फिरंगियों का युग आया i 1803 में एंग्लो – मराठा युद्ध में अहीरवाल राव तेज़ सिंह जी के नेतृत्व में अपने भाई मराठों के साथ खड़ा था लेकिन मराठा पराजय ने अहीर रियासत को अंग्रेजो का बैरी बना दिया i फिर , सन 1857 में समस्त हिन्द में बदलाव की उम्मीद ने अंगडाई ली i अहीरों की तलवारे फिर चमकी रणखेतों में i राव किशन सिंह जी की “मिसरी” चारण – भाटों के वीर रस के स्वरों में समा गयी i वीर अहीर एक बार फिर नसीबपुर में रणभूमि को लाल लहू से रंगने को तैयार थे i नसीबपुर में अहीरवाल की तलवारें विजय हासिल करने ही वाली थी कि एक अनहोनी हो गई i राव किशन सिंह जी फिरंगी सेनापति जेर्राद को काट कर बैरी से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए i हिन्द के गद्दार फिरंगियों से मिल गए i नसीबपुर की पराजय अहीरों को लील गई i वीर अहीरवाल को खण्डित कर दिया गया और सेना में अहीरों की भर्ती पर विराम लगा दिया गया i अंग्रेजो ने 1857 की क्रांति के बाद जाति आधारित फौज का गठन किया, जिस की वफादारी सिर्फ अंग्रेजो और जाति विशेष के प्रति थी न की मादरे वतन के लिए i अहीरों की जगह कुछ अंग्रेजपरस्त जातियों को फौज में स्थान मिला i अहीरवाल बिखर गया क्योंकि इस अर्ध – मरुस्थल व जल – विहीन भूमि में अहीर अपनी तलवार का खाते थे i पर प्रथम विश्व – युद्ध में जब अंग्रेजो को सैनिको की जरुरत पड़ी तो फिर उन्हें अहीर कौम की याद आयी i प्रथम विश्व – युद्ध ने अहीर सैनिक परम्परा को प्राणवायु प्रदान करी i प्रथम विश्व -युद्ध में अहीरों ने अपने शौर्य का ऐसा जलवा बिखेरा कि दितीय विश्व -युद्ध में करीब 39 हज़ार यदुवंशी मोर्चे पर थे जो कि किसी भी हिन्दू जाति की संख्या व उसके सैनिको के अनुपात में सर्वाधिक थे i बर्मा के मोर्चे पर अहीर कौम के शौर्य का परचम लहरा दिया -उमराव सिंह जी , विक्टोरिया क्रॉस नेi लेकिन , 1940 में सिंगापुर में अहीर सैनिको के विद्रोह ने अंग्रेजो के मन में इस जंगजू कौम का खौफ पैदा कर दिया और इस वजह से पृथक अहीर रेजिमेंट का गठन ना हो सका i 15 अगस्त 1947 में गुलामी की जंजीरे टूटी व नये भारत का उदय हुआ i फिर से अहीरों में उम्मीद जगी की अब न्याय होगा और उनकी रेजिमेंट बनेगी 1948 में अहीरों ने माँ भारती को अपने खून का तिलक किया कश्मीर मोर्चे पर i फिर आया 1962 , रेजांगला – 18 नवम्बर दीवाली के दिन, रणबांकुरे अहीरों ने खून की होली खेली – हिमालय की सफ़ेद बर्फ को अपने और अपने दुश्मनों के लहू से लाल रंग दिया i पर देखिये दुर्भाग्य , जब स्वर -सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने मुल्क के शहीदों के लिए “ए मेरे वतन के लोगों” गीत गाया तो उस में”कोई सिख, कोई जाट, मराठा तो थे” लेकिन अहीर नहीं थे i इस अपमान की वजह साफ़ थी – जब तक पृथक अहीर रेजिमेंट नहीं होगी , तब तक अहीर शौर्य को उचित सम्मान नहीं मिल सकता , जब तक कंधे पर “अहीर ” नहीं लिखा होगा , तब तक कौम का इतिहास अन्धकार में ही रहेगा i फिर 1965, 1971 पाकिस्तान, 1986 श्री लंका और 1999 कारगिल में अहीर खून तो खूब बहा लेकिन रेजिमेंट नहीं मिली i देश की सबसे बड़ी पंचायत में अहीरों ने ऐसे लोगों को भेजा जिन्होंने कौम की इस मांग को कभी अपनी आवाज़ नहीं दी i अपने निजी स्वार्थ और कायरता की वजह से उन्होंने कौम की इस जायज़ मांग को वज़न दिया ही नहीं i ये कैसी विडम्बना है – सिंहो की सरदारी सियारों के हाथ में थी i Lions being led by Donkeys i दिल्ली के आका भी अहीर रेजिमेंट के निर्माण में बाधाएं खड़ी करते रहे – कभी सेकुलरिज्म की आड़ में तो कभी जातिवाद के नाम पर i तोपखाने में अहीरों की नफरी को कम कर दिया गया , उनकी यूनिट्स को तोड़ दिया गया i अन्याय पर अन्याय होता रहा और अहीर नेतृत्व मौन रहा i इस को क्या कहें – कायरता , कमजोरी या कुछ ओर ? आम अहीर को तो रेजिमेंट के फायदे का ही इल्म नहीं था , अलग रेजिमेंट का ये प्रभाव होगा – 
1.कौम के नौजवानों को रोज़गार मिलता और समाज में सम्मान मिलता
2. कौम को पृथक रूप से पहचान और सम्मान मिलता
3. कौम के बहाए गए खून को वीरोचित सम्मान मिलता 
4. अहीर रेजिमेंटल सेंटर में रोज़गार , शिक्षा व मेडिकल की सुविधाएं मिलती
हमारा राष्ट्र – प्रेम , हमारी खुद्दारी और बागी तेवर देख कर अंग्रेजो ने यादवों को एक बागी कौम करार कर दिया था i वीर लेकिन बागी अहीरवाल के कई टुकड़े कर के मुल्क के गाद्दारों को दे दिए गए और एक मर्द कौम को उस के दो प्रमुख हथियारों- हल और सेना से दूर करने की कोशिश की i अंग्रेजो से तो हमे इन्साफ की उम्मीद नहीं थी लेकिन आज आज़ाद भारत में भी ये अन्याय क्यों ? आज भी इतनी कुर्बानियों के बाद भी ये जंगजू कौम “अहीर रेजिमेंट ” के लिए क्यों मोहताज़ है ? माँ भारती के सम्मान में हर युद्ध में, हमने अपने शीश अर्पित किये – 1948 बडगाम , 1962 रेजांगला, 1965 हाजी पीर , 1967 नाथू ला ,1971 बांग्लादेश , श्री लंका , 1999 टाइगर हिल -कारगिल , अक्षरधाम , संसद भवन – हर जगह यदुवंशी खून खूब बहा , लेकिन रेजिमेंट फिर भी न मिली i एक जंगजू कौम का इतना अपमान – क्या मुल्क आज़ाद है या आज भी फिरंगी राज है i 
अत: सब यदुवंशी मिल कर रणघोष करें – 
वोट वो ही पायेगा , जो “अहीर रेजिमेंट” बनवायेगा i


उठो यदुवंश के वीर सपूतो !
अहीर रेजिमेंट का निर्माण करो !!

reji3
यदुवंशियो के जीवन में फिर से
नव स्फूर्ति-नव प्राण भरो !!
बने रेजिमेंट हमारी
मिटे बेरोजगारी !
सभी लाओ एकता,
ख़त्म करो अनेकता
यादव कुल के हर घर में
फिर से नयी एक मुस्कान भरो
उठो यदुवंश के वीर सपूतो !
अहीर रेजिमेंट का निर्माण करो !!

सब अमीर-गरीबो को साथ लाकर
कुछ नव इतिहास रचाते है
सब संगठित हो जाये यादव कुल
ऐसी मुरली मधुर बजाते है
एक नवयुग की नूतन वीणा में
हाथो में सुदर्शन मन में गीता ज्ञान भरो।
उठो यदुवंश के वीर सपूतो !
अहीर रेजिमेंट का निर्माण करो !!
भूलो आपसी बैर भाव को
खंडित हो किसने क्या पाया ?
इस यदुवंश की फिर से
पलटा देंगे हम काया ।
अहीर रेजिमेंट की मंगल ध्वनी से !
धरती-आसमान गुंजायमान करो

उठो यदुवंश के वीर सपूतो !
अहीर रेजिमेंट का निर्माण करो !!
है कृष्णा इस वंश का रखवाला
इसकी जय-पराजय तुम्हारी है
तुममे से हर बालक यदुवंश का
रक्षक और पुजारी है।
रेजिमेंट गठन हो हर हाल में
^अमरजीत^ यह आह्वान करो।
उठो यदुवंश के वीर सपूतो !
अहीर रेजिमेंट का निर्माण करो !!

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